जय श्री गणेश

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तुम… अच्छी लगती हो


तुम… अच्छी लगती हो

जब तुम खुद में ही कहीं
खोई-खोई सी होती हो,
नींद की बाँहों में
आधी सोई… आधी जागी सी होती हो,
बिना कुछ कहे भी
जाने क्यों बहुत कुछ कह जाती हो…

तुम अच्छी लगती हो।

जब तुम मुझमें कहीं
धीरे-धीरे सी खो जाती हो,
कुछ मेरी होती हो,
कुछ अपनी ही रह जाती हो…

तुम्हारी बातों में मेरा नाम,
और मेरी खामोशी में तुम्हारा एहसास होता है,
तब लगता है जैसे
इस भीड़ भरी दुनिया में
कोई सिर्फ मेरा भी होता है…

तुम अच्छी लगती हो।

जब तुम रूठी-रूठी सी होती हो,
कभी खुद से,
कभी मुझसे
थोड़ी-थोड़ी टूटी सी होती हो…

तब तुम्हारी नाराज़गी भी
अजीब-सी प्यारी लगती है,
तुम दूर होकर भी
मेरे और करीब लगती हो।

मन करता है तुम्हें मनाऊँ,
तुम्हारी खामोशी को पढ़ूँ,
और बिना कुछ पूछे
बस तुम्हारे पास बैठा रहूँ…

शायद तुम कुछ न कहो,
शायद मैं भी कुछ न कहूँ,
लेकिन हमारी खामोशियों के बीच
जो बात होगी…

वो दुनिया की किसी भी बात से
ज़्यादा खूबसूरत होगी।

जब तुम
थोड़ी-सी अपनी लगती हो,
थोड़ी-सी अजनबी,
थोड़ी-सी हकीकत,
और थोड़ी-सी कोई अधूरी-सी कहानी…

जब तुम्हें देखकर लगता है
कि शायद तुम सच नहीं,
मेरे किसी खूबसूरत सपने का हिस्सा हो…

तब भी—

तुम अच्छी लगती हो।

तुम्हारी हँसी अच्छी लगती है,
तुम्हारी नाराज़गी अच्छी लगती है,
तुम्हारा चुप रहना अच्छा लगता है,
तुम्हारा बिना वजह मुस्कुरा देना अच्छा लगता है।

सच कहूँ…

तुम्हें किसी एक अंदाज़ में पसंद करना
मुझे कभी आया ही नहीं।

तुम जैसी भी होती हो,
जिस पल जैसी भी होती हो…

बस… अच्छी लगती हो।

और शायद प्यार यही तो है—

किसी को बदलकर चाहना नहीं,
बल्कि उसकी हर छोटी-सी कमी,
हर खामोशी, हर नाराज़गी,
हर अधूरेपन के साथ
उसे उसी तरह चाहना…

जैसी वो है।

और तुम…

तुम जैसी हो,
वैसी ही…
बहुत अच्छी लगती हो।
❤️


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