जय श्री गणेश

वो रविवार — जब मेरा पहला प्यार फिर सामने आया



वो रविवार — जब मेरा पहला प्यार फिर सामने आया

कुछ मुलाकातें कुछ घंटों की होती हैं…

लेकिन उनकी यादें जिंदगी भर साथ चलती हैं।

यह कहानी भी ऐसी ही एक मुलाकात की है।

मेरा नाम राज है।

और रानी

वो मेरी जिंदगी का पहला प्यार थी।

वक्त के साथ हमारी राहें अलग हो गईं। रानी की शादी हो गई। उसकी अपनी दुनिया बस गई और अब उसका एक छोटा-सा बेटा भी था—दीपम

जिंदगी बहुत आगे निकल चुकी थी।

लेकिन दिल…

दिल कभी-कभी वहीं ठहर जाता है, जहाँ उसे पहली बार प्यार मिला था।


वो रविवार

उस दिन रविवार था।

रानी जयपुर से इंदौर आ रही थी। उसने मुझे बताया था कि वो रात करीब 7:30 बजे इंदौर पहुँचेगी। इसके बाद उसे भोपाल जाना था

इसी भरोसे पर राज उस दिन अपनी नौकरी पर चला गया।

कंपनी में मोबाइल इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं थी, इसलिए राज को पता ही नहीं चला कि रानी समय से पहले इंदौर पहुँच गई है।

शाम करीब 6 बजे, जब राज कंपनी से बाहर निकला और उसने मोबाइल देखा, तो रानी का मैसेज था—

“मैं इंदौर आ गई हूँ।”

राज ने तुरंत जवाब करना चाहा।

लेकिन उसका जवाब रानी तक नहीं पहुँच पाया।

कुछ देर बाद राज ने मैसेज किया—

“कहाँ हो? कहाँ मिलना है?”

रानी का जवाब आया—

“कहीं नहीं… रहने दो।”

बस कुछ शब्द थे।

लेकिन राज समझ गया कि रानी नाराज़ है।

उसके दिल में डर बैठ गया।

“इतने सालों बाद मिलने आई थी… और मेरी वजह से नाराज़ होकर चली गई तो?”

राज ने फोन किया।

कोई जवाब नहीं।

फिर कॉल किया।

फिर भी नहीं।

मैसेज किए…

लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

राज ने बाइक सड़क के किनारे रोक दी।

उसके मन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

आख़िर वो रानी थी।

उसका पहला प्यार।

राज ने एक सिगरेट जलाई।

शायद उसे लगा कि इससे बेचैनी कम होगी।

लेकिन नहीं हुई।

उसने दूसरी सिगरेट भी जला ली।

फिर भी मोबाइल की स्क्रीन शांत थी।

आखिर राज ने उसे मैसेज किया—

“तूने ही तो कहा था कि 7:30 बजे आएगी। इसलिए मैं कंपनी से देर से निकला। मुझे पता नहीं था कि तू इतनी जल्दी आ जाएगी। गलती हो गई… माफ़ कर दे। एक बार मिल ले। बता, कहाँ आऊँ?”

कुछ देर बाद रानी का जवाब आया—

“मैं अभी अपनी फ्रेंड के घर हूँ। तू Chartered Bus Station आ जा। मैं भी वहीं आऊँगी। मेरी बस वहीं से मिलेगी।”

मैसेज पढ़ते ही राज के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

कुछ मिनट पहले तक जो दिल डर से भरा था, उसमें अचानक उम्मीद लौट आई।

उसने बाइक स्टार्ट की।

और Chartered Bus Station की तरफ निकल पड़ा।

शायद उस दिन वो बाइक नहीं चला रहा था…

वो अपने पुराने प्यार से मिलने जा रहा था।


एक चॉकलेट और बहुत सारा इंतज़ार

जल्दी में राज बाइक थोड़ी तेज चला रहा था।

मन में बस एक ही ख्याल था—

“कहीं मैं देर से न पहुँच जाऊँ… कहीं रानी फिर नाराज़ न हो जाए।”

रास्ते में राज ने सेंटर फ्रेश खरीदा और खा लिया, ताकि सिगरेट की गंध कम हो जाए।

फिर उसे दीपम की याद आई।

उसने सोचा—

“उसके बच्चे के लिए कुछ ले जाना चाहिए।”

राज ने दीपम के लिए एक चॉकलेट खरीद ली।

पता नहीं क्यों…

लेकिन उस बच्चे से मिलने की इच्छा भी उसके अंदर बहुत ज्यादा थी।

कुछ देर बाद राज Chartered Bus Station पहुँच गया।

लेकिन रानी वहाँ नहीं थी।

राज ने इंतज़ार करना शुरू किया।

उसके मोबाइल में सिर्फ 7% बैटरी बची थी।

उसे डर लग रहा था कि कहीं मोबाइल बंद न हो जाए।

अगर मोबाइल बंद हो गया तो?

रानी से बात कैसे होगी?

उसने मोबाइल डेटा बंद कर दिया और बाइक के पास खड़ा हो गया।

हर तरफ नजरें दौड़ाता रहा।

हर कुछ मिनट में लगता—

“शायद अब आएगी…”

करीब 30 मिनट गुजर गए।

लेकिन रानी नहीं आई।

राज की बेचैनी फिर बढ़ने लगी।

उसने फोन किया।

रानी ने फोन नहीं उठाया।

उसने डेटा चालू किया और मैसेज किया—

“कहाँ हो?”

फिर भी कोई जवाब नहीं।

राज ने फिर डेटा बंद कर दिया।

कुछ मिनट बाद उसने दोबारा डेटा चालू किया।

इस बार रानी का मैसेज था—

“ऑटो में हूँ… आ रही हूँ।”

राज के चेहरे पर फिर मुस्कान आ गई।

अब इंतज़ार मुश्किल नहीं लग रहा था।

क्योंकि उसे पता था…

वो आ रही है।


वो पल

राज अपनी बाइक के पास खड़ा था।

तभी एक लड़की ऑटो से आई और उसकी बाइक के बिल्कुल पास आकर खड़ी हो गई।

वो काफी देर तक वहीं खड़ी रही।

शायद उसे लगा कि राज उसी के लिए खड़ा है।

राज को भी कुछ पल के लिए अजीब लगा।

फिर वो लड़की अपने पिता से फोन पर बात करते हुए एक पेड़ के पास जाकर बैठ गई।

राज ने उस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

उसका इंतज़ार किसी और के लिए था।

रानी का।

कुछ देर बाद रानी आई।

वो उसी तरफ उतरी और राज को इशारा करके बुलाने लगी।

लेकिन राज उस तरफ देख ही नहीं रहा था।

रानी ने फोन किया और कहा—

“इधर देख।”

राज ने जैसे ही उसकी तरफ देखा…

कुछ पल के लिए उसकी नजर रानी की आँखों में ठहर गई।

इतने सालों के बाद सामने देखकर जाने कितनी पुरानी यादें एक साथ लौट आईं।

राज कुछ कह नहीं पाया।

बस उसकी आँखों में देखता रहा।

फिर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

लेकिन वही लड़की अभी भी पेड़ के पास बैठी थी।

राज को लगा कि अगर वो सीधे वहाँ गया तो उसे गलतफहमी हो सकती है।

इसलिए राज पेड़ के पीछे से घूमकर रानी के पास पहुँचा।

और फिर…

उसने दीपम को अपनी बाहों में लिया।


दीपम के साथ कुछ पल

दीपम बहुत प्यारा और चंचल बच्चा था।

कुछ ही पलों में राज उसके साथ घुल-मिल गया।

वो आगे-आगे चलता…

और राज उसके पीछे-पीछे भागता।

कभी दीपम इधर जाता, कभी उधर।

राज उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ता।

उसके साथ खेलते हुए राज के मन में एक अजीब-सा अपनापन पैदा हो रहा था।

ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी और का बच्चा नहीं…

उसका अपना बच्चा हो।

शायद रानी भी मन ही मन सोच रही होगी—

“इसे तो मेरे बच्चे से इतना प्यार हो गया है कि ये मुझे देख भी नहीं रहा…”

लेकिन सच यही था।

उस वक्त राज का पूरा ध्यान दीपम पर था।

वो उसके साथ खेलता रहा।

दीपम हँसता…

राज मुस्कुराता।

उसकी छोटी-छोटी शरारतों के पीछे भागता।

और मन ही मन सोचता रहा—

“काश… जिंदगी कुछ और होती।”

कुछ देर के लिए राज ने अपनी सारी परेशानियाँ भूल दी थीं।

न बीता हुआ वक्त याद था…

न आने वाली सुबह।

बस सामने रानी थी…

और उसके साथ दीपम।


बस में जाने का फैसला

कुछ देर बाद राज दीपम को लेकर बस की तरफ चलने लगा।

इतने में रानी भी अपना बैग लेकर पीछे से आई और बस में चढ़कर ऊपर वाली सीट की तरफ चली गई।

राज नीचे ही था।

उसे समझ नहीं आया कि रानी अचानक बस में क्यों चली गई।

उसने सोचा—

“शायद बैग रखने गई होगी… थोड़ी देर में वापस आ जाएगी।”

इसलिए राज फिर नीचे दीपम के साथ खेलने लगा।

दीपम बहुत चंचल था।

वो भागता और राज उसके पीछे भागता।

वो रुकता तो राज उसके पास बैठ जाता।

समय कब निकल गया, पता ही नहीं चला।

फिर दीपम को भूख लग गई।

तब तक रात के करीब 9 बज चुके थे।

रानी बस से नीचे आई और दीपम को लेकर अंदर चली गई।

राज बाहर खड़ा सोचने लगा—

“अब मुझे बस में जाना चाहिए या नहीं?”

मन में थोड़ा डर भी था।

“कहीं रानी किसी बात से फिर नाराज़ तो नहीं हो जाएगी?”

लेकिन दिल उसे छोड़कर जाने को तैयार नहीं था।

आखिर राज भी बस में चला गया।

रानी पहले ही ऊपर वाली सीट पर चढ़कर जा चुकी थी।

राज भी सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा।

दीपम उसके पास था।

राज ने उसे रानी के पास दे दिया।

दीपम को भूख लगी थी।

रानी ने उसे दूध दिया।

उसने दूध पिया…

और कुछ ही देर बाद फिर खेलने लगा।

राज उसे देखता रहा।

उस मासूम बच्चे को देखकर उसके दिल में बहुत प्यार उमड़ रहा था।

उस पल उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे—

रानी उसकी पत्नी है… और दीपम उसका अपना बच्चा।

कुछ पलों के लिए उसने अपनी असली जिंदगी भूल दी।

दिल कर रहा था कि वो यहीं बैठा रहे।

इन दोनों के साथ।

शायद मन के किसी कोने में यह भी इच्छा थी—

“काश, मैं भी इनके साथ भोपाल चला जाऊँ…”

लेकिन राज कुछ कह नहीं पा रहा था।

इतने सालों के बाद रानी उसके सामने थी, लेकिन शब्द जैसे कहीं खो गए थे।


“ठीक है…”

रात करीब 9:15 बजे रानी ने राज से कहा—

“ठीक है…”

राज ने उसकी बात को शायद इस तरह समझा कि वो उसे जाने के लिए कह रही है।

मगर उसका मन बिल्कुल नहीं था जाने का।

वो दीपम के साथ करीब पाँच मिनट और खेलता रहा।

शायद वो उन आखिरी पलों को थोड़ा और जी लेना चाहता था।

इसी बीच शायद रानी के फोन पर किसी का कॉल आया।

राज को लगा कि अब उसे निकल जाना चाहिए।

वो उठ गया।

दिल कह रहा था—

“थोड़ी देर और रुक जा…”

लेकिन कदम जाने के लिए उठ चुके थे।

राज नीचे उतर आया।

जाने से पहले उसने वापस रानी की तरफ देखा और इशारे से कहा—

“मैं जा रहा हूँ।”

रानी ने भी इशारे में कहा—

“जाओ…”

बस एक शब्द।

लेकिन उस एक शब्द ने राज के दिल में बहुत कुछ छोड़ दिया।


बस चली गई…

राज बस के बाहर आकर खड़ा हो गया।

उसने सोचा था कि बस चली जाएगी और वो घर चला जाएगा।

लेकिन उसके कदम वहीं रुक गए।

वो बस के जाने तक वहीं खड़ा रहा।

फिर बस धीरे-धीरे चलने लगी।

राज की नजर बस पर थी।

वो उसे तब तक देखता रहा, जब तक बस उसकी आँखों से दूर नहीं हो गई।

रानी अब भोपाल की तरफ जा रही थी।

और राज…

वहीं खड़ा रह गया था।

बस चली गई।

लेकिन उसका मन जैसे उसी बस के साथ चला गया।

कुछ देर तक राज चुपचाप खड़ा रहा।

उस रात उसे अंदर से बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था।

वो बाइक पर बैठा और घर की तरफ निकल पड़ा।

सड़क वही थी।

रात वही थी।

शहर वही था।

लेकिन राज के अंदर कुछ बदल चुका था।

कुछ घंटों पहले वो अपने पहले प्यार से मिलने गया था।

और अब उसके पास सिर्फ कुछ यादें थीं—

रानी की आँखों में वो मुलाकात…

दीपम की मासूम मुस्कान…

उसके साथ बिताए हुए कुछ घंटे…

और बस की वो आखिरी विदाई।

राज को उस रात एक बात समझ आई—

प्यार हमेशा किसी को पा लेने का नाम नहीं होता।

कभी-कभी प्यार का मतलब होता है किसी को सामने देखकर खुश होना…

उसके बच्चे की मुस्कान में अपनी खुशी ढूँढना…

कुछ घंटों को पूरी जिंदगी जैसा महसूस करना…

और फिर उसे अपनी आँखों के सामने दूर जाते हुए देखना।

रानी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुकी थी।

राज भी अपनी जिंदगी जी रहा था।

लेकिन उस रविवार की रात…

दोनों की जिंदगी के रास्ते कुछ घंटों के लिए फिर एक जगह आ मिले थे।

और शायद यही उन दोनों की कहानी की सबसे खूबसूरत बात थी।

वो साथ नहीं थे… फिर भी उस रात कुछ पल ऐसे थे, जब राज को लगा कि उसकी अधूरी कहानी पूरी हो गई है।

वो घर की तरफ बढ़ता रहा।

पीछे Chartered Bus Station की रोशनी धीरे-धीरे दूर होती जा रही थी।

लेकिन उसके दिल में उस रात की एक तस्वीर हमेशा के लिए रुक गई—

रानी सामने थी… दीपम उसके साथ था… और राज कुछ पलों के लिए उस जिंदगी में जी रहा था, जो शायद कभी उसकी हो ही नहीं सकती थी।

और शायद…

कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी।

क्योंकि कुछ कहानियाँ खत्म होने के बाद भी दिल में चलती रहती हैं।

और राज की कहानी भी अभी बाकी थी…

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