माँ — एक शब्द नहीं, पूरी दुनिया
Mother, Mama, Ammee, Mamá, अम्मा, आई, माई…
भाषाएँ अलग हैं, उच्चारण अलग हैं, शब्द अलग हैं…
लेकिन इन सब शब्दों में छुपा भाव एक ही है—“माँ।”
सर्द रातों में किसके हाथों की गर्माहट याद आती है?
लंबे और अकेले रास्तों पर किसका साथ चाहिए होता है?
थककर लौटने पर किसकी एक आवाज़ सुनकर मन को सुकून मिलता है?
माँ की।
माँ सिर्फ एक शब्द नहीं है।
माँ किसी रिश्ते का नाम भर नहीं है।
माँ एक इंसान के लिए पूरी दुनिया होती है।
इंसान अपनी माँ से दूर जा सकता है,
उससे महीनों बात किए बिना रह सकता है,
अपने काम और अपनी जिंदगी में इतना व्यस्त हो सकता है कि माँ को फोन करना भी भूल जाए…
लेकिन सच ये है कि—
माँ से दूर जाकर कोई कभी अपने घर से दूर नहीं हो पाता।
क्योंकि माँ जहाँ होती है,
वहीं घर होता है।
और माँ के बिना वही घर…
कितना भी बड़ा क्यों न हो,
कहीं न कहीं घर जैसा नहीं लगता।
ज़िंदगी चलती रहती है,
लोग मिलते हैं, रिश्ते बनते हैं,
हम बड़े होते जाते हैं…
लेकिन माँ के बिना जिंदगी में एक ऐसी खाली जगह रह जाती है,
जिसे दुनिया की कोई चीज़ भर नहीं सकती।
शायद कोई नहीं बता सकता…
शायद कोई ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि
एक बच्चा अपनी माँ के लिए क्या महसूस करता है।
और शायद…
एक माँ भी नहीं बता सकती कि वह अपने बच्चे के लिए क्या महसूस करती है।
जब बच्चा छोटा होता है,
माँ उसे पकड़कर चूमती है,
गले लगाती है,
उसके माथे पर हाथ रखती है,
उसकी छोटी-सी तकलीफ़ पर पूरी रात जाग जाती है।
तब बच्चे को लगता है—
माँ तो हमेशा मेरे साथ रहेगी।
फिर बच्चा बड़ा होने लगता है।
बातों में औपचारिकता आ जाती है।
गले लगने की जगह सिर्फ पैर छूना रह जाता है।
“माँ, कैसी हो?” की जगह
“हाँ माँ, मैं ठीक हूँ…” जैसे छोटे-छोटे जवाब रह जाते हैं।
और धीरे-धीरे…
प्यार कम नहीं होता, बस जताना कम हो जाता है।
एक उम्र के बाद माँ भी समझ जाती है कि उसका बच्चा बड़ा हो गया है।
अब उसे हर बात पर गले लगाना शायद अच्छा नहीं लगेगा।
हर बार माथे पर हाथ रखना शायद उसे बचकाना लगेगा।
इसलिए माँ अपने हाथ रोक लेती है।
लेकिन क्या उसके मन में भी वो प्यार रुक जाता है?
नहीं।
शायद आज भी माँ तुम्हें देखकर अपने मन में वही सवाल करती है—
“बच्चा… कैसा है तू?”
बस फर्क इतना है कि अब वह पूछ नहीं पाती।
वह फोन करती है और पूछती है—
“खाना खा लिया?”
“समय पर घर पहुँचे?”
“काम कैसा चल रहा है?”
“पैसे हैं ना?”
और हम सोचते हैं कि माँ तो बस यही सब पूछती रहती है।
लेकिन इन छोटे-छोटे सवालों के पीछे एक बहुत बड़ा सवाल छुपा होता है—
“मेरा बच्चा खुश तो है ना?”
माँ शायद आज भी तुम्हें गले लगाकर पूछना चाहती है—
“बच्चा… कैसा है तू?”
लेकिन कह नहीं पाती।
और शायद हम भी अपनी माँ को गले लगाकर बस इतना कहना चाहते हैं—
“माँ, मैं ठीक हूँ…
और तुम मेरे साथ हो,
तो सच में सब ठीक है।”
क्योंकि दुनिया चाहे हमें कितना भी मजबूत बना दे,
कितना भी बड़ा कर दे…
माँ के सामने हम आज भी वही छोटे बच्चे होते हैं,
जिन्हें उसकी गोद में सिर रखकर
कुछ देर के लिए दुनिया भूल जाना आता है।
इसलिए अगर माँ पास है…
तो आज उसे सिर्फ इतना मत पूछना—
“खाना खाया?”
कभी उसके पास बैठकर पूछना—
“माँ… तुम कैसी हो?”
हो सकता है वह मुस्कुराकर कह दे—
“मैं तो ठीक हूँ।”
लेकिन उसकी आँखों में शायद वह जवाब मिल जाए,
जो वह शब्दों में कभी नहीं कह पाई—
“बस तू खुश रह…
मेरे लिए इतना ही काफी है।”
माँ… सच में एक शब्द नहीं।
माँ वो दुनिया है,
जिसके बिना पूरी दुनिया भी अधूरी लगती है। ❤️







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��जय श्री गणेश��
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