जय श्री गणेश

शायद मैं खुद को ही समझ नहीं पा रही…



शायद मैं खुद को ही समझ नहीं पा रही…

मैं हमेशा हर चीज़ से भागना क्यों चाहती हूँ?

लोगों से…
बातों से…
रिश्तों से…
और शायद सबसे ज्यादा—खुद से।

कभी-कभी मैं सीरियल इसलिए नहीं देखती कि मुझे वो पसंद हैं,
बल्कि इसलिए देखती हूँ क्योंकि उनके किरदारों की जिंदगी में खोकर
कुछ देर के लिए अपनी जिंदगी से दूर हो सकती हूँ।

किसी से बात नहीं करती,
क्योंकि डर लगता है…

कहीं कोई मेरे बहुत करीब न आ जाए,
कहीं उसे मेरी कमजोरियाँ न दिखाई देने लगें,
कहीं उसे पता न चल जाए कि जिस इंसान को वो मजबूत समझ रहा है,
वो अंदर से कितना थक चुका है।

मैं लोगों को avoid करती हूँ,
लेकिन सच ये है कि शायद मैं लोगों से नहीं,
अपने भीतर चल रही उन आवाज़ों से भाग रही हूँ
जिनसे मैं खुद भी नहीं बच पाती।

पता नहीं मेरी जिंदगी में क्या चल रहा है।

कभी-कभी इतना stress होता है कि लगता है—
सब कुछ बस यहीं रोक दूँ।

फिर खुद को याद दिलाती हूँ…

शायद जिंदगी पर हमारा पूरा अधिकार कभी था ही नहीं।

हमने इसे चुना नहीं था,
हमें ये जिंदगी मिली थी।

तो शायद इसे खत्म करने का फैसला भी
सिर्फ हमारी थकान के भरोसे नहीं किया जा सकता।

क्योंकि शायद अभी कहानी खत्म नहीं हुई है…

शायद मैं बस उस पन्ने पर हूँ
जहाँ मुझे आगे क्या लिखना है,
ये दिखाई नहीं दे रहा।

और शायद इसी उलझन में
मेरे मन में एक और ख्याल बार-बार आता है—

माँ बनना।

पता नहीं क्यों लगता है कि
शायद एक बच्चा मेरी जिंदगी में आएगा
तो सब ठीक हो जाएगा।

शायद मेरा ध्यान बदल जाएगा।
शायद मुझे जीने की कोई वजह मिल जाएगी।
शायद मेरे अंदर की ये खाली जगह भर जाएगी।

लेकिन फिर एक डर सामने खड़ा हो जाता है—

अगर ऐसा नहीं हुआ तो?

अगर बच्चा आने के बाद भी
मेरे अंदर का ये शोर वैसा ही रहा तो?

फिर मैं क्या करूँगी?

क्या मैं इसके लिए तैयार हूँ?

शायद नहीं।

Emotionally मैं बहुत कमजोर हो चुकी हूँ।
शरीर में क्या चल रहा है, ये भी हर बार समझ नहीं आता,
और दिमाग…

दिमाग तो जैसे हर वक्त किसी अनजान रास्ते पर दौड़ता रहता है।

मैं इन सबके बारे में सोचना नहीं चाहती।

सच में नहीं चाहती।

लेकिन हर विचार को रोक पाना
हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।

कभी किसी से बात करने का बहुत मन करता है।

बस कोई हो…

जो मेरी बात बीच में काटे नहीं,
मुझे समझाने की जल्दी न करे,
मेरी जिंदगी के फैसले मेरे लिए न करे।

बस चुपचाप सुने।

लेकिन अजीब बात है…

लोग हैं।

कुछ ऐसे भी हैं जो शायद मुझे समझ सकते हैं।

फिर भी मैं उनसे बात नहीं करना चाहती।

शायद इसलिए कि कुछ बातें कह देना आसान नहीं होता।

कभी-कभी समस्या ये नहीं होती कि
“किससे बात करें?”

समस्या ये होती है कि—

“जो अंदर है, उसे शब्दों में कैसे रखें?”

मैं खुद नहीं समझ पा रही कि मुझे जिंदगी से चाहिए क्या।

कभी लगता है बहुत कुछ चाहिए।
कभी लगता है कुछ भी नहीं चाहिए।

कभी लगता है मैं बहुत आगे जा सकती हूँ,
और अगले ही पल ऐसा लगता है
जैसे मैं किसी बंद कमरे में फँसी हुई हूँ…

चारों तरफ दीवारें हैं,
दरवाज़ा दिखाई नहीं देता,
और आवाज़ लगाने के लिए
कोई पास नहीं है।

कभी-कभी बहुत अकेलापन लगता है।

ऐसा अकेलापन जिसमें
भीड़ भी साथ नहीं दे पाती।

शायद कुछ समय बाद
मैं इन सब चीज़ों को समझ पाऊँ।

शायद एक दिन मुझे पता चल जाए
कि मैं किससे भाग रही थी,
किस चीज़ की तलाश में थी,
और मुझे वास्तव में चाहिए क्या।

लेकिन अभी…

अभी मेरे पास जवाब नहीं हैं।

सिर्फ सवाल हैं।

बहुत सारे सवाल।

और मैं बस चाहती हूँ कि
इन सवालों के जवाब मिलने तक
मैं खुद को खो न दूँ।

क्योंकि मुझे डर लगता है—

कहीं ऐसा न हो कि
जवाब मिलने से पहले ही
मैं इतनी थक जाऊँ कि आगे बढ़ने की ताकत न बचे।

मैं नहीं चाहती कि मेरी कहानी
मेरे सवालों के साथ ही खत्म हो जाए।

मैं चाहती हूँ कि एक दिन
मैं पीछे मुड़कर इस समय को देखूँ
और खुद से कह सकूँ—

“हाँ… वो वक्त बहुत मुश्किल था,
लेकिन मैं उससे निकल आई।”

शायद मुझे अभी किसी बड़े समाधान की जरूरत नहीं है।

शायद मुझे बस
एक ऐसा इंसान चाहिए
जो मेरे पास बैठकर कहे—

“तुम्हें अभी सब समझने की जरूरत नहीं है।
बस आज का दिन मेरे साथ निकाल लो।”

और शायद…

कभी-कभी जिंदगी को बचाने के लिए
पूरी जिंदगी का जवाब नहीं चाहिए होता।

बस अगला कदम दिखाई देना चाहिए।

और मैं…

शायद अभी उसी अगले कदम की तलाश में हूँ।

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तुम… अच्छी लगती हो


तुम… अच्छी लगती हो

जब तुम खुद में ही कहीं
खोई-खोई सी होती हो,
नींद की बाँहों में
आधी सोई… आधी जागी सी होती हो,
बिना कुछ कहे भी
जाने क्यों बहुत कुछ कह जाती हो…

तुम अच्छी लगती हो।

जब तुम मुझमें कहीं
धीरे-धीरे सी खो जाती हो,
कुछ मेरी होती हो,
कुछ अपनी ही रह जाती हो…

तुम्हारी बातों में मेरा नाम,
और मेरी खामोशी में तुम्हारा एहसास होता है,
तब लगता है जैसे
इस भीड़ भरी दुनिया में
कोई सिर्फ मेरा भी होता है…

तुम अच्छी लगती हो।

जब तुम रूठी-रूठी सी होती हो,
कभी खुद से,
कभी मुझसे
थोड़ी-थोड़ी टूटी सी होती हो…

तब तुम्हारी नाराज़गी भी
अजीब-सी प्यारी लगती है,
तुम दूर होकर भी
मेरे और करीब लगती हो।

मन करता है तुम्हें मनाऊँ,
तुम्हारी खामोशी को पढ़ूँ,
और बिना कुछ पूछे
बस तुम्हारे पास बैठा रहूँ…

शायद तुम कुछ न कहो,
शायद मैं भी कुछ न कहूँ,
लेकिन हमारी खामोशियों के बीच
जो बात होगी…

वो दुनिया की किसी भी बात से
ज़्यादा खूबसूरत होगी।

जब तुम
थोड़ी-सी अपनी लगती हो,
थोड़ी-सी अजनबी,
थोड़ी-सी हकीकत,
और थोड़ी-सी कोई अधूरी-सी कहानी…

जब तुम्हें देखकर लगता है
कि शायद तुम सच नहीं,
मेरे किसी खूबसूरत सपने का हिस्सा हो…

तब भी—

तुम अच्छी लगती हो।

तुम्हारी हँसी अच्छी लगती है,
तुम्हारी नाराज़गी अच्छी लगती है,
तुम्हारा चुप रहना अच्छा लगता है,
तुम्हारा बिना वजह मुस्कुरा देना अच्छा लगता है।

सच कहूँ…

तुम्हें किसी एक अंदाज़ में पसंद करना
मुझे कभी आया ही नहीं।

तुम जैसी भी होती हो,
जिस पल जैसी भी होती हो…

बस… अच्छी लगती हो।

और शायद प्यार यही तो है—

किसी को बदलकर चाहना नहीं,
बल्कि उसकी हर छोटी-सी कमी,
हर खामोशी, हर नाराज़गी,
हर अधूरेपन के साथ
उसे उसी तरह चाहना…

जैसी वो है।

और तुम…

तुम जैसी हो,
वैसी ही…
बहुत अच्छी लगती हो।
❤️


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माँ — एक शब्द नहीं, पूरी दुनिया


माँ — एक शब्द नहीं, पूरी दुनिया

Mother, Mama, Ammee, Mamá, अम्मा, आई, माई…

भाषाएँ अलग हैं, उच्चारण अलग हैं, शब्द अलग हैं…
लेकिन इन सब शब्दों में छुपा भाव एक ही है—“माँ।”

सर्द रातों में किसके हाथों की गर्माहट याद आती है?
लंबे और अकेले रास्तों पर किसका साथ चाहिए होता है?
थककर लौटने पर किसकी एक आवाज़ सुनकर मन को सुकून मिलता है?

माँ की।

माँ सिर्फ एक शब्द नहीं है।
माँ किसी रिश्ते का नाम भर नहीं है।

माँ एक इंसान के लिए पूरी दुनिया होती है।

इंसान अपनी माँ से दूर जा सकता है,
उससे महीनों बात किए बिना रह सकता है,
अपने काम और अपनी जिंदगी में इतना व्यस्त हो सकता है कि माँ को फोन करना भी भूल जाए…

लेकिन सच ये है कि—

माँ से दूर जाकर कोई कभी अपने घर से दूर नहीं हो पाता।

क्योंकि माँ जहाँ होती है,
वहीं घर होता है।

और माँ के बिना वही घर…
कितना भी बड़ा क्यों न हो,
कहीं न कहीं घर जैसा नहीं लगता।

ज़िंदगी चलती रहती है,
लोग मिलते हैं, रिश्ते बनते हैं,
हम बड़े होते जाते हैं…

लेकिन माँ के बिना जिंदगी में एक ऐसी खाली जगह रह जाती है,
जिसे दुनिया की कोई चीज़ भर नहीं सकती।

शायद कोई नहीं बता सकता…

शायद कोई ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि
एक बच्चा अपनी माँ के लिए क्या महसूस करता है।

और शायद…

एक माँ भी नहीं बता सकती कि वह अपने बच्चे के लिए क्या महसूस करती है।

जब बच्चा छोटा होता है,
माँ उसे पकड़कर चूमती है,
गले लगाती है,
उसके माथे पर हाथ रखती है,
उसकी छोटी-सी तकलीफ़ पर पूरी रात जाग जाती है।

तब बच्चे को लगता है—
माँ तो हमेशा मेरे साथ रहेगी।

फिर बच्चा बड़ा होने लगता है।

बातों में औपचारिकता आ जाती है।
गले लगने की जगह सिर्फ पैर छूना रह जाता है।
“माँ, कैसी हो?” की जगह
“हाँ माँ, मैं ठीक हूँ…” जैसे छोटे-छोटे जवाब रह जाते हैं।

और धीरे-धीरे…

प्यार कम नहीं होता, बस जताना कम हो जाता है।

एक उम्र के बाद माँ भी समझ जाती है कि उसका बच्चा बड़ा हो गया है।

अब उसे हर बात पर गले लगाना शायद अच्छा नहीं लगेगा।
हर बार माथे पर हाथ रखना शायद उसे बचकाना लगेगा।
इसलिए माँ अपने हाथ रोक लेती है।

लेकिन क्या उसके मन में भी वो प्यार रुक जाता है?

नहीं।

शायद आज भी माँ तुम्हें देखकर अपने मन में वही सवाल करती है—

“बच्चा… कैसा है तू?”

बस फर्क इतना है कि अब वह पूछ नहीं पाती।

वह फोन करती है और पूछती है—

“खाना खा लिया?”

“समय पर घर पहुँचे?”

“काम कैसा चल रहा है?”

“पैसे हैं ना?”

और हम सोचते हैं कि माँ तो बस यही सब पूछती रहती है।

लेकिन इन छोटे-छोटे सवालों के पीछे एक बहुत बड़ा सवाल छुपा होता है—

“मेरा बच्चा खुश तो है ना?”

माँ शायद आज भी तुम्हें गले लगाकर पूछना चाहती है—

“बच्चा… कैसा है तू?”

लेकिन कह नहीं पाती।

और शायद हम भी अपनी माँ को गले लगाकर बस इतना कहना चाहते हैं—

“माँ, मैं ठीक हूँ…
और तुम मेरे साथ हो,
तो सच में सब ठीक है।”

क्योंकि दुनिया चाहे हमें कितना भी मजबूत बना दे,
कितना भी बड़ा कर दे…

माँ के सामने हम आज भी वही छोटे बच्चे होते हैं,
जिन्हें उसकी गोद में सिर रखकर
कुछ देर के लिए दुनिया भूल जाना आता है।

इसलिए अगर माँ पास है…

तो आज उसे सिर्फ इतना मत पूछना—

“खाना खाया?”

कभी उसके पास बैठकर पूछना—

“माँ… तुम कैसी हो?”

हो सकता है वह मुस्कुराकर कह दे—

“मैं तो ठीक हूँ।”

लेकिन उसकी आँखों में शायद वह जवाब मिल जाए,
जो वह शब्दों में कभी नहीं कह पाई—

“बस तू खुश रह…
मेरे लिए इतना ही काफी है।”

माँ… सच में एक शब्द नहीं।
माँ वो दुनिया है,
जिसके बिना पूरी दुनिया भी अधूरी लगती है।
❤️

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वो रविवार — जब मेरा पहला प्यार फिर सामने आया



वो रविवार — जब मेरा पहला प्यार फिर सामने आया

कुछ मुलाकातें कुछ घंटों की होती हैं…

लेकिन उनकी यादें जिंदगी भर साथ चलती हैं।

यह कहानी भी ऐसी ही एक मुलाकात की है।

मेरा नाम राज है।

और रानी

वो मेरी जिंदगी का पहला प्यार थी।

वक्त के साथ हमारी राहें अलग हो गईं। रानी की शादी हो गई। उसकी अपनी दुनिया बस गई और अब उसका एक छोटा-सा बेटा भी था—दीपम

जिंदगी बहुत आगे निकल चुकी थी।

लेकिन दिल…

दिल कभी-कभी वहीं ठहर जाता है, जहाँ उसे पहली बार प्यार मिला था।


वो रविवार

उस दिन रविवार था।

रानी जयपुर से इंदौर आ रही थी। उसने मुझे बताया था कि वो रात करीब 7:30 बजे इंदौर पहुँचेगी। इसके बाद उसे भोपाल जाना था

इसी भरोसे पर राज उस दिन अपनी नौकरी पर चला गया।

कंपनी में मोबाइल इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं थी, इसलिए राज को पता ही नहीं चला कि रानी समय से पहले इंदौर पहुँच गई है।

शाम करीब 6 बजे, जब राज कंपनी से बाहर निकला और उसने मोबाइल देखा, तो रानी का मैसेज था—

“मैं इंदौर आ गई हूँ।”

राज ने तुरंत जवाब करना चाहा।

लेकिन उसका जवाब रानी तक नहीं पहुँच पाया।

कुछ देर बाद राज ने मैसेज किया—

“कहाँ हो? कहाँ मिलना है?”

रानी का जवाब आया—

“कहीं नहीं… रहने दो।”

बस कुछ शब्द थे।

लेकिन राज समझ गया कि रानी नाराज़ है।

उसके दिल में डर बैठ गया।

“इतने सालों बाद मिलने आई थी… और मेरी वजह से नाराज़ होकर चली गई तो?”

राज ने फोन किया।

कोई जवाब नहीं।

फिर कॉल किया।

फिर भी नहीं।

मैसेज किए…

लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

राज ने बाइक सड़क के किनारे रोक दी।

उसके मन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी।

आख़िर वो रानी थी।

उसका पहला प्यार।

राज ने एक सिगरेट जलाई।

शायद उसे लगा कि इससे बेचैनी कम होगी।

लेकिन नहीं हुई।

उसने दूसरी सिगरेट भी जला ली।

फिर भी मोबाइल की स्क्रीन शांत थी।

आखिर राज ने उसे मैसेज किया—

“तूने ही तो कहा था कि 7:30 बजे आएगी। इसलिए मैं कंपनी से देर से निकला। मुझे पता नहीं था कि तू इतनी जल्दी आ जाएगी। गलती हो गई… माफ़ कर दे। एक बार मिल ले। बता, कहाँ आऊँ?”

कुछ देर बाद रानी का जवाब आया—

“मैं अभी अपनी फ्रेंड के घर हूँ। तू Chartered Bus Station आ जा। मैं भी वहीं आऊँगी। मेरी बस वहीं से मिलेगी।”

मैसेज पढ़ते ही राज के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

कुछ मिनट पहले तक जो दिल डर से भरा था, उसमें अचानक उम्मीद लौट आई।

उसने बाइक स्टार्ट की।

और Chartered Bus Station की तरफ निकल पड़ा।

शायद उस दिन वो बाइक नहीं चला रहा था…

वो अपने पुराने प्यार से मिलने जा रहा था।


एक चॉकलेट और बहुत सारा इंतज़ार

जल्दी में राज बाइक थोड़ी तेज चला रहा था।

मन में बस एक ही ख्याल था—

“कहीं मैं देर से न पहुँच जाऊँ… कहीं रानी फिर नाराज़ न हो जाए।”

रास्ते में राज ने सेंटर फ्रेश खरीदा और खा लिया, ताकि सिगरेट की गंध कम हो जाए।

फिर उसे दीपम की याद आई।

उसने सोचा—

“उसके बच्चे के लिए कुछ ले जाना चाहिए।”

राज ने दीपम के लिए एक चॉकलेट खरीद ली।

पता नहीं क्यों…

लेकिन उस बच्चे से मिलने की इच्छा भी उसके अंदर बहुत ज्यादा थी।

कुछ देर बाद राज Chartered Bus Station पहुँच गया।

लेकिन रानी वहाँ नहीं थी।

राज ने इंतज़ार करना शुरू किया।

उसके मोबाइल में सिर्फ 7% बैटरी बची थी।

उसे डर लग रहा था कि कहीं मोबाइल बंद न हो जाए।

अगर मोबाइल बंद हो गया तो?

रानी से बात कैसे होगी?

उसने मोबाइल डेटा बंद कर दिया और बाइक के पास खड़ा हो गया।

हर तरफ नजरें दौड़ाता रहा।

हर कुछ मिनट में लगता—

“शायद अब आएगी…”

करीब 30 मिनट गुजर गए।

लेकिन रानी नहीं आई।

राज की बेचैनी फिर बढ़ने लगी।

उसने फोन किया।

रानी ने फोन नहीं उठाया।

उसने डेटा चालू किया और मैसेज किया—

“कहाँ हो?”

फिर भी कोई जवाब नहीं।

राज ने फिर डेटा बंद कर दिया।

कुछ मिनट बाद उसने दोबारा डेटा चालू किया।

इस बार रानी का मैसेज था—

“ऑटो में हूँ… आ रही हूँ।”

राज के चेहरे पर फिर मुस्कान आ गई।

अब इंतज़ार मुश्किल नहीं लग रहा था।

क्योंकि उसे पता था…

वो आ रही है।


वो पल

राज अपनी बाइक के पास खड़ा था।

तभी एक लड़की ऑटो से आई और उसकी बाइक के बिल्कुल पास आकर खड़ी हो गई।

वो काफी देर तक वहीं खड़ी रही।

शायद उसे लगा कि राज उसी के लिए खड़ा है।

राज को भी कुछ पल के लिए अजीब लगा।

फिर वो लड़की अपने पिता से फोन पर बात करते हुए एक पेड़ के पास जाकर बैठ गई।

राज ने उस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

उसका इंतज़ार किसी और के लिए था।

रानी का।

कुछ देर बाद रानी आई।

वो उसी तरफ उतरी और राज को इशारा करके बुलाने लगी।

लेकिन राज उस तरफ देख ही नहीं रहा था।

रानी ने फोन किया और कहा—

“इधर देख।”

राज ने जैसे ही उसकी तरफ देखा…

कुछ पल के लिए उसकी नजर रानी की आँखों में ठहर गई।

इतने सालों के बाद सामने देखकर जाने कितनी पुरानी यादें एक साथ लौट आईं।

राज कुछ कह नहीं पाया।

बस उसकी आँखों में देखता रहा।

फिर धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।

लेकिन वही लड़की अभी भी पेड़ के पास बैठी थी।

राज को लगा कि अगर वो सीधे वहाँ गया तो उसे गलतफहमी हो सकती है।

इसलिए राज पेड़ के पीछे से घूमकर रानी के पास पहुँचा।

और फिर…

उसने दीपम को अपनी बाहों में लिया।


दीपम के साथ कुछ पल

दीपम बहुत प्यारा और चंचल बच्चा था।

कुछ ही पलों में राज उसके साथ घुल-मिल गया।

वो आगे-आगे चलता…

और राज उसके पीछे-पीछे भागता।

कभी दीपम इधर जाता, कभी उधर।

राज उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ता।

उसके साथ खेलते हुए राज के मन में एक अजीब-सा अपनापन पैदा हो रहा था।

ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी और का बच्चा नहीं…

उसका अपना बच्चा हो।

शायद रानी भी मन ही मन सोच रही होगी—

“इसे तो मेरे बच्चे से इतना प्यार हो गया है कि ये मुझे देख भी नहीं रहा…”

लेकिन सच यही था।

उस वक्त राज का पूरा ध्यान दीपम पर था।

वो उसके साथ खेलता रहा।

दीपम हँसता…

राज मुस्कुराता।

उसकी छोटी-छोटी शरारतों के पीछे भागता।

और मन ही मन सोचता रहा—

“काश… जिंदगी कुछ और होती।”

कुछ देर के लिए राज ने अपनी सारी परेशानियाँ भूल दी थीं।

न बीता हुआ वक्त याद था…

न आने वाली सुबह।

बस सामने रानी थी…

और उसके साथ दीपम।


बस में जाने का फैसला

कुछ देर बाद राज दीपम को लेकर बस की तरफ चलने लगा।

इतने में रानी भी अपना बैग लेकर पीछे से आई और बस में चढ़कर ऊपर वाली सीट की तरफ चली गई।

राज नीचे ही था।

उसे समझ नहीं आया कि रानी अचानक बस में क्यों चली गई।

उसने सोचा—

“शायद बैग रखने गई होगी… थोड़ी देर में वापस आ जाएगी।”

इसलिए राज फिर नीचे दीपम के साथ खेलने लगा।

दीपम बहुत चंचल था।

वो भागता और राज उसके पीछे भागता।

वो रुकता तो राज उसके पास बैठ जाता।

समय कब निकल गया, पता ही नहीं चला।

फिर दीपम को भूख लग गई।

तब तक रात के करीब 9 बज चुके थे।

रानी बस से नीचे आई और दीपम को लेकर अंदर चली गई।

राज बाहर खड़ा सोचने लगा—

“अब मुझे बस में जाना चाहिए या नहीं?”

मन में थोड़ा डर भी था।

“कहीं रानी किसी बात से फिर नाराज़ तो नहीं हो जाएगी?”

लेकिन दिल उसे छोड़कर जाने को तैयार नहीं था।

आखिर राज भी बस में चला गया।

रानी पहले ही ऊपर वाली सीट पर चढ़कर जा चुकी थी।

राज भी सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा।

दीपम उसके पास था।

राज ने उसे रानी के पास दे दिया।

दीपम को भूख लगी थी।

रानी ने उसे दूध दिया।

उसने दूध पिया…

और कुछ ही देर बाद फिर खेलने लगा।

राज उसे देखता रहा।

उस मासूम बच्चे को देखकर उसके दिल में बहुत प्यार उमड़ रहा था।

उस पल उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे—

रानी उसकी पत्नी है… और दीपम उसका अपना बच्चा।

कुछ पलों के लिए उसने अपनी असली जिंदगी भूल दी।

दिल कर रहा था कि वो यहीं बैठा रहे।

इन दोनों के साथ।

शायद मन के किसी कोने में यह भी इच्छा थी—

“काश, मैं भी इनके साथ भोपाल चला जाऊँ…”

लेकिन राज कुछ कह नहीं पा रहा था।

इतने सालों के बाद रानी उसके सामने थी, लेकिन शब्द जैसे कहीं खो गए थे।


“ठीक है…”

रात करीब 9:15 बजे रानी ने राज से कहा—

“ठीक है…”

राज ने उसकी बात को शायद इस तरह समझा कि वो उसे जाने के लिए कह रही है।

मगर उसका मन बिल्कुल नहीं था जाने का।

वो दीपम के साथ करीब पाँच मिनट और खेलता रहा।

शायद वो उन आखिरी पलों को थोड़ा और जी लेना चाहता था।

इसी बीच शायद रानी के फोन पर किसी का कॉल आया।

राज को लगा कि अब उसे निकल जाना चाहिए।

वो उठ गया।

दिल कह रहा था—

“थोड़ी देर और रुक जा…”

लेकिन कदम जाने के लिए उठ चुके थे।

राज नीचे उतर आया।

जाने से पहले उसने वापस रानी की तरफ देखा और इशारे से कहा—

“मैं जा रहा हूँ।”

रानी ने भी इशारे में कहा—

“जाओ…”

बस एक शब्द।

लेकिन उस एक शब्द ने राज के दिल में बहुत कुछ छोड़ दिया।


बस चली गई…

राज बस के बाहर आकर खड़ा हो गया।

उसने सोचा था कि बस चली जाएगी और वो घर चला जाएगा।

लेकिन उसके कदम वहीं रुक गए।

वो बस के जाने तक वहीं खड़ा रहा।

फिर बस धीरे-धीरे चलने लगी।

राज की नजर बस पर थी।

वो उसे तब तक देखता रहा, जब तक बस उसकी आँखों से दूर नहीं हो गई।

रानी अब भोपाल की तरफ जा रही थी।

और राज…

वहीं खड़ा रह गया था।

बस चली गई।

लेकिन उसका मन जैसे उसी बस के साथ चला गया।

कुछ देर तक राज चुपचाप खड़ा रहा।

उस रात उसे अंदर से बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था।

वो बाइक पर बैठा और घर की तरफ निकल पड़ा।

सड़क वही थी।

रात वही थी।

शहर वही था।

लेकिन राज के अंदर कुछ बदल चुका था।

कुछ घंटों पहले वो अपने पहले प्यार से मिलने गया था।

और अब उसके पास सिर्फ कुछ यादें थीं—

रानी की आँखों में वो मुलाकात…

दीपम की मासूम मुस्कान…

उसके साथ बिताए हुए कुछ घंटे…

और बस की वो आखिरी विदाई।

राज को उस रात एक बात समझ आई—

प्यार हमेशा किसी को पा लेने का नाम नहीं होता।

कभी-कभी प्यार का मतलब होता है किसी को सामने देखकर खुश होना…

उसके बच्चे की मुस्कान में अपनी खुशी ढूँढना…

कुछ घंटों को पूरी जिंदगी जैसा महसूस करना…

और फिर उसे अपनी आँखों के सामने दूर जाते हुए देखना।

रानी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुकी थी।

राज भी अपनी जिंदगी जी रहा था।

लेकिन उस रविवार की रात…

दोनों की जिंदगी के रास्ते कुछ घंटों के लिए फिर एक जगह आ मिले थे।

और शायद यही उन दोनों की कहानी की सबसे खूबसूरत बात थी।

वो साथ नहीं थे… फिर भी उस रात कुछ पल ऐसे थे, जब राज को लगा कि उसकी अधूरी कहानी पूरी हो गई है।

वो घर की तरफ बढ़ता रहा।

पीछे Chartered Bus Station की रोशनी धीरे-धीरे दूर होती जा रही थी।

लेकिन उसके दिल में उस रात की एक तस्वीर हमेशा के लिए रुक गई—

रानी सामने थी… दीपम उसके साथ था… और राज कुछ पलों के लिए उस जिंदगी में जी रहा था, जो शायद कभी उसकी हो ही नहीं सकती थी।

और शायद…

कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी।

क्योंकि कुछ कहानियाँ खत्म होने के बाद भी दिल में चलती रहती हैं।

और राज की कहानी भी अभी बाकी थी…

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