शायद मैं खुद को ही समझ नहीं पा रही…
मैं हमेशा हर चीज़ से भागना क्यों चाहती हूँ?
लोगों से…
बातों से…
रिश्तों से…
और शायद सबसे ज्यादा—खुद से।
कभी-कभी मैं सीरियल इसलिए नहीं देखती कि मुझे वो पसंद हैं,
बल्कि इसलिए देखती हूँ क्योंकि उनके किरदारों की जिंदगी में खोकर
कुछ देर के लिए अपनी जिंदगी से दूर हो सकती हूँ।
किसी से बात नहीं करती,
क्योंकि डर लगता है…
कहीं कोई मेरे बहुत करीब न आ जाए,
कहीं उसे मेरी कमजोरियाँ न दिखाई देने लगें,
कहीं उसे पता न चल जाए कि जिस इंसान को वो मजबूत समझ रहा है,
वो अंदर से कितना थक चुका है।
मैं लोगों को avoid करती हूँ,
लेकिन सच ये है कि शायद मैं लोगों से नहीं,
अपने भीतर चल रही उन आवाज़ों से भाग रही हूँ
जिनसे मैं खुद भी नहीं बच पाती।
पता नहीं मेरी जिंदगी में क्या चल रहा है।
कभी-कभी इतना stress होता है कि लगता है—
सब कुछ बस यहीं रोक दूँ।
फिर खुद को याद दिलाती हूँ…
शायद जिंदगी पर हमारा पूरा अधिकार कभी था ही नहीं।
हमने इसे चुना नहीं था,
हमें ये जिंदगी मिली थी।
तो शायद इसे खत्म करने का फैसला भी
सिर्फ हमारी थकान के भरोसे नहीं किया जा सकता।
क्योंकि शायद अभी कहानी खत्म नहीं हुई है…
शायद मैं बस उस पन्ने पर हूँ
जहाँ मुझे आगे क्या लिखना है,
ये दिखाई नहीं दे रहा।
और शायद इसी उलझन में
मेरे मन में एक और ख्याल बार-बार आता है—
माँ बनना।
पता नहीं क्यों लगता है कि
शायद एक बच्चा मेरी जिंदगी में आएगा
तो सब ठीक हो जाएगा।
शायद मेरा ध्यान बदल जाएगा।
शायद मुझे जीने की कोई वजह मिल जाएगी।
शायद मेरे अंदर की ये खाली जगह भर जाएगी।
लेकिन फिर एक डर सामने खड़ा हो जाता है—
अगर ऐसा नहीं हुआ तो?
अगर बच्चा आने के बाद भी
मेरे अंदर का ये शोर वैसा ही रहा तो?
फिर मैं क्या करूँगी?
क्या मैं इसके लिए तैयार हूँ?
शायद नहीं।
Emotionally मैं बहुत कमजोर हो चुकी हूँ।
शरीर में क्या चल रहा है, ये भी हर बार समझ नहीं आता,
और दिमाग…
दिमाग तो जैसे हर वक्त किसी अनजान रास्ते पर दौड़ता रहता है।
मैं इन सबके बारे में सोचना नहीं चाहती।
सच में नहीं चाहती।
लेकिन हर विचार को रोक पाना
हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।
कभी किसी से बात करने का बहुत मन करता है।
बस कोई हो…
जो मेरी बात बीच में काटे नहीं,
मुझे समझाने की जल्दी न करे,
मेरी जिंदगी के फैसले मेरे लिए न करे।
बस चुपचाप सुने।
लेकिन अजीब बात है…
लोग हैं।
कुछ ऐसे भी हैं जो शायद मुझे समझ सकते हैं।
फिर भी मैं उनसे बात नहीं करना चाहती।
शायद इसलिए कि कुछ बातें कह देना आसान नहीं होता।
कभी-कभी समस्या ये नहीं होती कि
“किससे बात करें?”
समस्या ये होती है कि—
“जो अंदर है, उसे शब्दों में कैसे रखें?”
मैं खुद नहीं समझ पा रही कि मुझे जिंदगी से चाहिए क्या।
कभी लगता है बहुत कुछ चाहिए।
कभी लगता है कुछ भी नहीं चाहिए।
कभी लगता है मैं बहुत आगे जा सकती हूँ,
और अगले ही पल ऐसा लगता है
जैसे मैं किसी बंद कमरे में फँसी हुई हूँ…
चारों तरफ दीवारें हैं,
दरवाज़ा दिखाई नहीं देता,
और आवाज़ लगाने के लिए
कोई पास नहीं है।
कभी-कभी बहुत अकेलापन लगता है।
ऐसा अकेलापन जिसमें
भीड़ भी साथ नहीं दे पाती।
शायद कुछ समय बाद
मैं इन सब चीज़ों को समझ पाऊँ।
शायद एक दिन मुझे पता चल जाए
कि मैं किससे भाग रही थी,
किस चीज़ की तलाश में थी,
और मुझे वास्तव में चाहिए क्या।
लेकिन अभी…
अभी मेरे पास जवाब नहीं हैं।
सिर्फ सवाल हैं।
बहुत सारे सवाल।
और मैं बस चाहती हूँ कि
इन सवालों के जवाब मिलने तक
मैं खुद को खो न दूँ।
क्योंकि मुझे डर लगता है—
कहीं ऐसा न हो कि
जवाब मिलने से पहले ही
मैं इतनी थक जाऊँ कि आगे बढ़ने की ताकत न बचे।
मैं नहीं चाहती कि मेरी कहानी
मेरे सवालों के साथ ही खत्म हो जाए।
मैं चाहती हूँ कि एक दिन
मैं पीछे मुड़कर इस समय को देखूँ
और खुद से कह सकूँ—
“हाँ… वो वक्त बहुत मुश्किल था,
लेकिन मैं उससे निकल आई।”
शायद मुझे अभी किसी बड़े समाधान की जरूरत नहीं है।
शायद मुझे बस
एक ऐसा इंसान चाहिए
जो मेरे पास बैठकर कहे—
“तुम्हें अभी सब समझने की जरूरत नहीं है।
बस आज का दिन मेरे साथ निकाल लो।”
और शायद…
कभी-कभी जिंदगी को बचाने के लिए
पूरी जिंदगी का जवाब नहीं चाहिए होता।
बस अगला कदम दिखाई देना चाहिए।
और मैं…
शायद अभी उसी अगले कदम की तलाश में हूँ।







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��जय श्री गणेश��
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